इस्राईल के वैक्सीन को लेकर रंगभेदी व्यवहार के बीच, जन स्वास्थ्य को बेहतर बनाने पर इस्राईली पुरस्कार को क़ुबूल करना, अनैतिक है।
जब ऑस्ट्रेलिया की प्रोफ़ेसर अलिसन बैशफ़र्ड को इस्राईल के डैन डेविड प्राइज़ को क़ुबूल करने के फ़ैसले पर फिर से विचार करने के लिए हम एक खुला ख़त चारों ओर भेज रहे थे, हमे उम्मीद थी कि पूरी दुनिया के बुद्धिजीवियों की ओर से हमारी इस अपील को अपार समर्थन मिलेगा। हम सही थे। 300 से ज़्यादा बुद्धिजीवि और शोधकर्ता अब तक इस ख़त पर दस्तख़त कर चुके हैं और लिस्ट में नाम बढ़ता जा रहा है।
बैशफ़र्ड उन 7 लोगों में हैं जिन्हें यह प्राइज़ मिला। इस साल यह प्राइज़ जन स्वास्थ्य और दवा के क्षेत्र में बौद्धिक योगदान देने के लिए दिया गया है।
यह प्राइज़ ऐसे वक़्त दिया गया जब इस्राईल अपनी आबादी को टीका लगाने में हासिल बड़ी कामयाबी की ख़ुशी मना रहा है। दुनिया में प्रतिशत की नज़र से सबसे ज़्यादा इस्राईल में लोगों को टीका लगा है। इस्राईली सरकार ने हाल में बताया था कि टीके की पहली डोज़ क़रीब 50 फ़ीसद और दूसरी डोज़ क़रीब 35 फ़ीसद इस्राईलियों को लगायी जा चुकी है।
लेकिन, इस्राईल की ओर से मनायी गयी दूसरी वैज्ञानिक कामयाबियों के साथ, यह कामयाबी ऐसी हालत में मनायी गयी जब फ़िलिस्तीनियों का दमन जारी है। एक ओर जहाँ इस्राईली सरकार कोविड-19 केस में तेज़ी से कमी आने पर गर्व कर रही है, दूसरी ओर इस्राईल के क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में इसके केस आसमान को छू रहे हैं। वहाँ पैन्डेमिक को क़ाबू करने के लिए फ़िलिस्तीनियों को एक और लॉकडाउन का सामना है, क्योंकि उन्हें लगातार टीके की सप्लाई नहीं हो पा रही है।
इस्राईल, महीनों से ग़ज़्ज़ा और वेस्ट बैंक में फ़िलिस्तीनियों को टीका लगाने से मना कर रहा है, हालांकि चौथे जनेवा कन्वेन्शन के तहत यह उसकी क़ानूनी ज़िम्मेदारी है। मार्च 2020 में फ़िलिस्तीन के क़ाबिज़ इलाक़ों के लिए यूएन के विशेष रैपोर्टर (प्रतिवेदक) माइकल लिंक ने एक बयान में इस्राईल को याद दिलाया थाः “चौथे जनेवा कन्वेन्शन के 56वें अनुच्छेद में वर्णित क़ानूनी दायित्व का तक़ाज़ा है कि क़ाबिज़ इस्राईल, संक्रामक बीमारियों और एपिडेमिक को फैलने से रोकने के लिए जो एहतियाती साधन मौजूद हैं, उसके इस्तेमाल को सुनिश्चित करे।”
अब तक इस्राईल न सिर्फ़ यह कि फ़िलिस्तीनियों तक टीके पहुंचने की कोशिश को नाकाम बनाने में लगा हुआ है, बल्कि अपने पास इज़ाफ़ी डोज़ को हॉन्डुरास, चेक गणराज्य और हंग्री को भेज रहा है, जो इन देशों को अपने दूतावास को पूर्वी अलक़ुद्स में दुबारा क़ायम करने या उसकी शाखा वहाँ खोलने के वादे जैसे राजनैतिक लाभ के बदले में दे रहा है।
शायद इंसानी कामयाबी की सैद्धांतिक ख़ुशी और बड़ी मात्रा में पैसा जीतने के जोश की वजह से, इस्राईल के पूरी तरह क़ब्ज़े में 50 लाख फ़िलिस्तीनियों की पीड़ा को भूलना आसान रहा हो, जिनके पास पैन्डेमिक से बचाव का कोई प्रभावी उपाय नहीं है और उन्हें इस्राईल की ओर से गंभीर रूप से मनमानी जेल की सज़ा, अदालत के अख़्तियार से बाहर हत्या, देश निकाला, शोक, अत्याचार और संपत्ति से बेदख़ली का सामना है।
इस प्राइज़ को रद्द करने की ताज़ा मिसाल 2018 की है जब ब्रिटिश इतिहासकार कैथ्रिन हॉल ने “एक आज़ाद राजनैतिक चयन” कहते हुए प्राइज़ लेने से मना किया था। ऐसा चयन जिसकी बहुत से लोगों ने उनके नस्ल, ग़ुलामी और जेन्डर हिस्ट्री पर सुधारवादी बौद्धिक काम के अनुकूल होने की तारीफ़ की थी।
इस प्राइज़ को क़ुबूल करने से पैसों का बड़ा फ़ायदा है, लेकिन इसकी नैतिक क़ीमत बहुत बड़ी है, क्योंकि ऐसा करने से प्राइज़ जीतने वाले, इतिहास के उस ग़लत साइड पर चले जाते जो अत्याचार, अन्याय और निर्दयता का समर्थन करने और उसकी लीपापोती करने वाली व्यवस्था का साथ देती है।